बुधवार, सितम्बर 18, 2019
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पलानी बाबा का उपदेश – भाग 2

Source: – Hindupost.in

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आईएसआईएस और अल-कायदा के इस युग में मुसलमानों के कट्टरपंथीकरण की प्रक्रिया और तरीकों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। बुद्धिजीवी और राजनेता समान रूप से, खनिज तेल से वित्त पोषित सऊदी वहाबी विचारधारा को इसके लिए दोषी ठहरा रहे हैं जो आधुनिक प्रौद्योगिकी के साधनों, इंटरनेट और मोबाइल प्रौद्योगिकी के साधनों द्वारा कट्टरपंथ फैला रहे हैं।

पुराने कट्टरपंथीकरण कार्यक्रम, जो अन्य स्थानों और समयों में किए गए, के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

यहां, हम आपके लिए एक करिश्माई कट्टरपंथी उपदेशक पलानी बाबा, जिसने 1980 और 1990 के दशक में सम्पूर्ण तमिलनाडु की की यात्रा की थी, द्वारा कट्टरपंथी विचारों और तरीकों को सामने लाने का प्रयास करेंगे। संभवतः हिंदू चरमपंथियों के एक समूह द्वारा 1997 में उसकी हत्या कर दी गई थी।

मोमिनों को एकजुट करने का दृष्टिकोण

हमेशा से “पाक” इस्लाम के एक ब्रांड का प्रचार करने का मुख्य उद्देश्य मोमिनों को जेहादी सेना में भर्ती होने के लिए आकर्षित करना रहा है ।

हालांकि एक धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य के विरोध के संदर्भ में, इसका लक्ष्य काफी स्पष्ट है – मुस्लिमों के लिए एक राज्य की स्थापना, जो शरिया कानून से चलती हो। इसको संघर्ष और प्रयास के माध्यम से भी साधा जाता है, अर्थात् जिहाद। वह काफी स्पष्ट कहता है कि वह अपनी बेटी के लिए दूल्हे की तलाश में नहीं है, वह संघर्ष के लिए हिंसक प्रकृति के युवा लोगों को खोजना चाहता है।

पलानी बाबा की विरासत के कई उत्तराधिकारी द्रविड़वादियों के साथ अक्सर एक तमिल परंपरा के उत्तराधिकारी और एक तमिल राष्ट्र में सह-राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं, जो सिर्फ मुस्लिम ही होते हैं। पलानी बाबा का उपदेश सीधे तौर पर कौम की धारणा के विपरीत। अपने एक भाषण में, वह पाकिस्तान के संस्थापक मु. अली जिन्ना को “हमारे जिन्ना” के रूप में संदर्भित करता है, सिर्फ इसलिए कि वह मोमिनों की ही बिरादरी के हैं।

कट्टरता के अधिकांश सैद्धान्तिक कारण जैसे गरीबी, विघटन और शैक्षिक विषमता इसके सामने स्वतः ही धूल फाँकने लगते हैं। यह सब बाबरी मस्जिद के युग से पहले की बात है, जब राम जन्मभूमि आंदोलन हिंदू लामबंदी का एक साधन बन गया था, पर इसका प्रभाव दक्षिण में बहुत कम देखा गया था।

काफिरों के साथ संबंध

काफ़िरों के बीच रहने को आग के बीच रहने की स्थिति के रूप में देखा जाता है। मुस्लिम राज्य स्थापित करने के लिए गैर-मुसलमानों के बीच प्रयास करना सर्वोच्च लक्ष्य माना जाता है। वह इस्लाम का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को मारने के लिए, तलवार चलाने वाले युवकों को भी उकसाता है।

वह गैर-मुस्लिमों को इस्लाम सिखाने और उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने की आवश्यकता के बारे में बोलता हैं। इस्लाम की सच्चाई को अपने तक रखना स्वार्थ है। जिस तरह से उनके भाषण हिंदू धर्म की व्याख्या करते हैं वह द्रविड़ राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता है – वह बड़े करीने से हिंदुओं को ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों में विभाजित करता है। उनकी दुश्मनी स्पष्ट रूप से ब्राह्मणों के प्रति है, एक वर्ग जिसे 1980 के दशक में बाहरी लोगों के रूप में देखा जाता था और जिनके खिलाफ तमिल समाज में पर्याप्त मात्रा में पूर्वाग्रह था।

इसके साथ ही वह गाय की हिंदू-पूजा का उल्लेख भी करता है- “आपके लिए, यह पवित्र है पर मेरे लिए, यह मिट्टी के एक ढेले से अधिक नहीं है।” उसके एक भाषण में वैदिक साहित्य का आधार लेकर गलतफहमियों से भरा एक आक्षेप भी शामिल है जिसमें वह कुत्तों और मनुष्यों को खाने वाले बलिदान शामिल होने की बात करता है।

यहाँ, हम फिर से तलवार की नोक पर अपने विश्वासों को अन्य लोगों से मनवाने का प्राचीन इस्लामी तरीका सामने आता है, जिसमे कुफ़्र को रक्षात्मक ढाल के रूप में उपयोग किया जाता है। गैर-आस्तिकों के साथ रिश्ते में विषमता को बनाए रखने के लिए गाय के वध को एक साधन के रूप में देखा जाता है, जहां गैर-मोमिनों को मुस्लिमों से सम्मान की भीख मांगनी पड़ती है, लेकिन वहीं मुसलमान गैर-मुसलमानों को सम्मान देने को बाध्य नहीं है। इसके अलावा, यहाँ वह हमेशा उन हिंदुओं का वर्णन इस्लाम विरोधी ‘ब्राह्मण’ के रूप में करता है, कभी भी हिंदू के रूप में नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि श्रीलंका में एक भाषण में, वह वहां के मुसलमानों को सरकार के प्रति निष्ठावान बने रहने के लिए प्रेरित करता हैं, क्योंकि वहाँ की सरकार के पास सुलझाने के लिए अन्य बड़ी समस्याएं हैं। चूंकि यह संघर्ष के समय के दौरान है, उसने उल्लेख किया है कि श्रीलंका में तमिल हिंदुओं के सामने अन्य बड़ी समस्याएं होंगी और वे मुसलमानों के कट्टर व्यवहार कट्टरता से विरोध नहीं करेंगे – जैसे गोहत्या पर प्रतिबंध लगाना आदि।

हथियार  नियंत्रण

एक भाषण में उसे एक तलवार भेंट की जाती है जिसपर वह खुले तौर पर हथियारों को धारण करने की आवश्यकता की बात करता है, क्योंकि वह उस वक्त को युद्ध की स्थिति मानता है।

यह वास्तव में दिलचस्प है कि तमिलनाडु, एक ऐसा राज्य जिसमें अपेक्षाकृत कम दंगे होते थे, जहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हल्की प्रतिद्वंद्विता और सह-अस्तित्व का एक लंबा इतिहास था, लोग युद्ध और संघर्ष की बात करने को उतारू थे ।

गैर-मुस्लिम राज्य से निपटना

वह न्यायपालिका और प्रेस से मिले खराब समर्थन की शिकायत करता है। प्रमुख मामलों में वह गोहत्या के खिलाफ याचिका, कलकत्ता उच्च न्यायालय में कुरान के खिलाफ याचिका और राम जन्मभूमि मामले की बात करता है।

वह भारतीय राज्य की न्याय व्यवस्था के लिए एक गहन पर्यवेक्षक मालूम होता है। उनकी दो टिप्पणियां जो यह बयां करती है –

  • संवैधानिक प्रावधानों की अस्पष्टता, जो ऐसी भाषा में है कि किसी को उससे असहमति नहीं होगी, लेकिन वास्तविक कार्यान्वयन व्यक्तिगत नियमों / अधिसूचनाओं और निर्णयों में निहित है जो व्यक्तिपरक हो सकते हैं।
  • निर्णय जो केवल हिंसा के खतरे के तहत न्यायालयों द्वारा मजबूरी में माने जाते हैं, अर्थात्, समूहों का हिंसा में लिप्त होने की क्षमता और उनकी मांगों को हिंसा द्वारा मनवाने की क्षमता।

राज्य के लिए उसका दृष्टिकोण आवश्यकतानुसार सहयोग है, अर्थात्, तब तक ही राज्य को मानना है जब तक कि वह मोमिनोन के मुख्य हितों की बात करे और इसके विरुद्ध ना जाये। वह अक्सर राज्य के साथ किसी भी वार्ता में प्राथमिक शक्ति के रूप में मोमिनों के बीच की एकता की आवश्यकता पर जोर देता है।

उपदेश शैली

  • उसकी प्राथमिकता युवा तमिल मुस्लिम लोगों की लामबंदी है, जिसको वह परिवार, कैरियर और अवकाश संबंधित चिंताओं से ऊपर उठकर इस्लाम को समर्पित करना चाहता है।
  • युवक को वह आत्मसम्मान हीन होने के ताने देता है और कुफ़्र-समाज के बीच रहने के प्रलोभन में फंसे रहने पर लानत करता है।
  • तमिल मुस्लिम को वह इस्लामी कौम के अन्य फिरकों जैसे सऊदी सईद मुसलमानों के समान भागीदार के रूप में होने की बात करता है, इस प्रकार प्रभावी रूप से इस्लाम में प्रचलित अफजल/अजलाफ के अंतरों का विरोध करता है। यह मुख्यधारा के द्रविड़ों की जातिगत राजनीति में सटीक बैठता है।
  • कुफ़्र दुश्मन को वह ब्राह्मण समान मानता है, क्योंकि यह राजनीतिक मुख्यधारा के द्रविड़वादी ब्रांड के विरुद्ध नहीं है। हिंदू और ब्राह्मण को एक ही जाति में मिलाया गया है, ताकि प्रभावी रूप से द्रविड़वादी राजनीति के विभिन्न धड़ों से सहयोगियों की तलाश की जा सके। यह काफी फायदेमंद साबित हुआ क्योंकि तमिलनाडु में किसी भी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी का इस समीकरण के साथ कोई विरोध नहीं है।
  • बार-बार एक विशिष्ट पुरोहित वर्ग की उपस्थिति और हिंदू विश्वदृष्टि की गतिशील प्रकृति का उपयोग ब्राह्मणों (हिंदुओं) को जातिवादी, धर्मांध और ‘पाखंडी’ के रूप में चिह्नित करने के लिए किया जाता है। यह एक बहुत प्रभावी रणनीति है क्योंकि वैश्विक धर्मों में समानता को एक सार्वभौमिक गुण के रूप में और धर्म में अविश्वास को बेईमानी के रूप में माना जाता रहा है।
  • इस्लामी विद्वानों के धार्मिक ग्रन्थों के उद्धरण की अपील पर भरोसा करने के बजाय, उपदेश को सरल, रोजमर्रा की भाषा में तार्किक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसको कुरान में रहस्योद्घाटन के पहले सिद्धांतों और हदीसों में पैगंबर का अनुकरणीय आचरण से आसानी से निष्कर्ष के रूप में निकाला जा सकता है ।
  • भाषा की तरह ही, वैसे हालात पर चिंता प्रकट की जाती है जिसे छोटे शहरों में रह रहे औसत तमिल मुसलमान सामना करते हैं। पलानी बाबा वैश्विक भू-राजनीति की समझ को प्रदर्शित करता है, लेकिन उसे लोगों के सामने किस तरह से पेश करना है यह उसका अपना दृष्टिकोण होता है।
  • उसके वक्तव्यों में उसके सुझाए तथ्यों के अधिकार का कोई तार्किक प्रमाण और श्रोत नहीं है। सारे अधिकार सीधे कुरान, हदीसों और चार रशीदुन खलीफाओं की जीवन गाथाओं से लिया गया है। यह उन सभी समकालीन विद्वानों की शैली को ध्यान में रखते हुए है जो आधुनिक जिहाद की दार्शनिक रूपरेखा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, अबू बक्र अल-नाजी की शिक्षाओं में इसे देख सकते हैं।

निष्कर्ष

इस दो लेखों की श्रृंखला (पहला भाग) में, हमारा उद्देश्य मुस्लिम आबादी के कट्टरता की सार्वभौमिक प्रकृति बताना करना रहा है। कट्टरपंथ की विचारधारा आबादी के बाहर से लाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह इस्लाम की शिक्षाओं के मूल में पाया जाता है।

भले ही मुस्लिम आबादी गैर-मोमिनों के आसपास की आबादी की तुलना में वंचित नहीं रहा है, वे शोषित होने की कथानक बनाते हैं जिससे जिहादियों के कट्टरपंथी सेना का निर्माण करने में कोई मुश्किल नहीं होती।

जिहादी पहनावों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी इन्हीं प्रचारकों के जिम्मे है न कि किसी बहुचर्चित संगठन का। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए भी यह बहुत मुश्किल हो जाता है कि वे ऐसे संदेश, जो जमीन से जुड़े कुख्यात प्रचारों और और लोगों को पहचानें, अलग करें और नष्ट कर पाएँ।

आज के तमिलनाडु के जिहादी कोर का निर्माण 1990 के युवाओं द्वारा किया गया था जो इस व्यक्ति के साथ थे। इस प्रकार, पलानी बाबा के उपदेश जैसे मूल श्रोत प्रक्रियाओं और परिणामों को समझने के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक हैं।

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