मंगलवार, मई 26, 2020
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हिन्दू देवी-देवता और संस्कृत जापानी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं – बिनोय के बहल – भारत का भित्तिचित्रण

हमने जापान में संयोग से इन दोनों वेणुगोपाल को देखा। वहाँ मुझे लगा कि आप यह जानने के लिए उत्सुक हो सकते हैं कि हिन्दू देवी-देवताओं की जापान में उतनी ही पूजा होती है जितनी कि भारत में। आपको वास्तव में यह जानकर आश्चर्य होगा कि यहां जापान में एकमात्र सरस्वती मां के सैकड़ों मंदिर हैं जिसमें 250 फुट ऊंचा मंदिर भी है और सरस्वती मां के मंदिर भारत में देखने को नही मिलते। लक्ष्मी माता की यहां पूजा होती है। बहुत सारे देवी-देवता हैं, इतने सारे शिव हैं, ब्रम्हा हैं, यहां तक की यमराज का मंदिर है।

वास्तिवकता में आपको ये जानकर भी आश्चर्य होगा कि हवन या होमा जिसको जापानी भाषा में “गोमा” कहते है, वो जापान के 1200 से अधिक मंदिरों में हर दिन संस्कृत मंत्रोच्चार द्वारा किया जाता है, और अधिकांश परिस्थितियों में दो बार होता है। और जापान के पुजारी संस्कृत मंत्रोच्चार कैसे करते हैं क्योंकि उनमें से कई पुजारी संस्कृत नहीं पढ़ सकते। यह हमें सबसे सुंदर बिंदु लाता है जो यह है कि “काना”, जापानी वर्णमाला जो वास्तिवकता में संस्कृत ध्वनि से मिलता जुलता बनाया गया था। इसलिए आप जापान के किसी भी प्राथमिक विद्यालय में जाएं वहां बच्चों को अ, आ, इ, ई, उ, ऊ बोल कर पढ़ते सुन सकते हैं जैसा भारत में होता है। इस प्रकार जापानी पुजारियों के सामने पूजा की पुस्तकें होती हैं जिसमें संस्कृत के मंत्र होते हैं और उसी के साथ काना में ध्वन्यात्मक लिखा होता है और यदि संस्कृत के मंत्र ना पढ़ सकें तो वो काना में पढ़ कर संस्कृत में मंत्रोच्चार कर लेते हैं। अब ये कौन सी संस्कृत है, ये पांचवीं छठीं शताब्दी की हस्तलिपि है, सिद्धम।

सिद्धम जो भारत में भुलाई जा चुकी है और भारत में ऐसी कोई जगह नहीं जहां सिद्धम पढ़ाई जाती हो, लेकिन जापान में आज भी जीवित है। वस्तुतः जापान में “कोयासान” नाम का स्कूल है जहां अध्यापक सिद्धम लिपि में लिखते हैं। यदि आप YouTube पर जाएं और “भारतीय देवी-देवताओं की जापान में पूजा” ढूंढें, आपको इस विषय पर मेरी फिल्म मिल जाएंगी। अतः एशिया में भारतीय प्रभाव बहुत विशाल है।

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