बुधवार, सितम्बर 30, 2020
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प्रोजेक्ट थेसालोनिका और जल्लीकट्टू जैसे लोकप्रिय हिंदू त्योहारों पर इसका प्रभाव

थेसालोनिका के अध्यादेश, मेरा मतलब है, एक रोमन सम्राट ने धर्म और पशु बलि पर पूजा करने की सभी मूर्तिपूजक के प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था।  लोगों का कहना है की 400 ईस्वी में एक निश्चित समय पर ओलंपिक भी रोक दिए गए थे।  कोई नहीं बताता कि उन्हें क्यों रोका गया।  ओलंपिक और साथ में अन्य मूर्तिपूजक प्रथाएँ, ओलिम्पिक और ओलिम्पिक के खेल, किसी ना किसी तरह से देवताओं के पूजा-अर्चना से संबंधित थे जो की कदाचित यहूदी, बृहस्पति या हेरा से संबंधित थे ।  इसीलिए वहाँ ऐसे ही कुछ पुजाएँ होती थी साथ में ऐसी कईं गतिविधि, साथ में रथ दौड़ और अन्य कई खेल प्रतियोगिता शामिल थे और यही माध्यम उस समुदाय के लिए थे जिससे मूर्तिपूजक चर्च से दूर रहते थे । इसी कारण वहाँ के राजा ने इस पे प्रतिबंध लगाया यह कह कर की यह हमारे लिए घृणास्पद है ।

आइए हम 1600 से 2006 में चलते हैं,मदुराई में मद्रास के उच्च न्यायालय के न्यायपीठ में । मदुराई के मद्रास हाइ कोर्ट के न्यायपीठ में एक अभियोग का बिषय आया । मेरे खयाल से यह संभवतः मुनियास्वामी थेवर मामले के प्रतिवादी थे।  वहाँ मंदिर के बिषय में विवाद था,  मंदिर में एक वार्षिक उत्सव हुआ करता था, एक प्रकार का मेला, और मेले के एक भाग के रूप में एक रेक्ला दौड़ होता था ।  रेक्ला एक ऐसी दौड़ है, जहां एक बैल को एक गाड़ी से बांध दिया जाता है और दौड़ होती थी, और यह मंदिर से संबन्धित थी, और यह मान्यता थी की अगर रकाल दौड़ काराएंगे, आप का अच्छा दौड़ होगा तो मंदिर में भगवान को संतुष्ट करेगी, अय्यनार  को, मंदिर में भगवान अय्यनार को ।  गाँव में विभिन्न जातियों और विभिन्न गुटों के बीच विवाद था और इसलिए इस धार्मिक उत्सव को रोक दिया गया था। और इसीलिए मुनियासेमी थेवर ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुराई पीठ के समक्ष उन्होंने रेक्ला को जारी रखने अनुरोध पेश किया ।

न्यायमूर्ति भानुमथी उस समय मदुरई के मद्रास उच्च न्यायालय की  न्यायपीठ में थे जो अभी देश के सर्वोच्च न्यायालया में हैं ।  उन्होने कहा कि इसे अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि यह बैलों के प्रति क्रूरता का गठन करता था और इसमें एकतरफ़ा रूप से मुर्गा लड़ाई और जल्लीकट्टू प्रथा शामिल किया ।  ये प्रथाएँ कभी भी चर्चा में नहीं थीं, लेकिन उन्होंने इन प्रथाओं को शामिल किया और कहा कि ये जानवरों के साथ क्रूरता है और क्योंकि यह पशुइओन के प्रति क्रूरता अंतर्भुक्त है और इसे मंजूरी नहीं दी जा सकती । और तब आपके पास इसका एक क्रियाशील पारितंत्र आ गया जिसने ईसी निर्णया को आगे तक लिया और  तब मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले गए और ऐसे अन्य कई उथल-पुथल हुये ।

अगर आप सभी तथ्यों पर ध्यान दें, तो फैसले से पहले किसी को भी यह अंदाज़ा नहीं था की यह कैसा लगता है, ऐसा किसिने देखा नहीं था । सबसे बड़ा मेला कुछ ऐसा था जिसमें केरल और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित अलंगनल्लूर नामक गांव के हजारों लोगों ने भाग लिया था।  जिसकी सुध कोई नहीं लेता था, यह साल में एक दिन होता था और केवल कुछ बैल ही चलते थे।  कुछ लोगों को लगभग 30 सेकंड के लिए बैल ऊपर झूलना होता था और  कोई भी 30 से अधिक सेकंड के लिए एक भागते हुए बैल पर नहीं झूल सकता था, इतना बलशाली बैल, और आप तुरंत ही गिर जाएँगे, ऐसा एक दिन हर साल में होता था, देश की किसी एक दूर-दराज़ी कोने में ।  और सर्वोच्च न्यालाया इससे जोश पूर्णा क्यों था क्योंकि इसकी आचार विधि के कारण, यह नास्तिक अथवा बुतपरसती है  और घृणास्पद है । यह सब जो पशुओं की अधिकारों की बात करते हैं, महिलाओं की अधिकारों की बात करते हैं, और पर्यावरण का भी, यह सब, यह जो दमनकारी भाषा नियोजित है, इन सबके केंद्र में नास्तिक व बुतपरसतों के लिए घृणा थी, उनके अथवा बुतपरस्तों की हर एक प्रदर्शनियों के प्रति, उनकी धार्मिक प्रथाओं का प्रदर्शन है जो अब्राहम नैतिकता के लिए अरुचिकर है।


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