रविवार, जुलाई 12, 2020
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बौद्ध मठों द्वारा कश्मीर की चित्रकला विरासत की सुरक्षा

Translation: Mahesh Srimali.

अल्ची 108 मठ केंद्रों में से एक है। यह एक पौराणिक संख्या है, और इसके सत्य होने की संभावना भी है।  यह  १०८ मठों की श्रृंखला, ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र के शुरुआती मठ थे। ये मठ गूजे के राजा येशे -Ö के शासनकाल में बने थे, इसमें पश्चिमी तिब्बत, लद्दाख, लाहौल-स्पीति और किन्नौर शामिल थे। ये सभी अद्भुत मठ मंदिर, जो उस समय के महान बौद्ध केंद्रों में से एक थे, उन्हें कश्मीर से आमंत्रित कलाकारों ने चित्रों एवं मूर्तियों से अलंकृत किया था। जो कला इन मठों के अंदर पाई जाती है, चाहे वह लद्दाख में हो या पश्चिमी तिब्बत में, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्राचीन काल के कश्मीर की संस्कृति का एकमात्र जीवित दृश्य दर्शाती है। कश्मीर घाटी के भीतर की सभी चित्रकला नष्ट कर दी गयी थी, और अब केवल लद्दाख से लेकर पश्चिमी तिब्बत तक के इन चित्रों में ही हम उस समय के कश्मीर में वास्तविक  कला, वास्तुकला, वस्त्रकला, विषय-वस्तु इत्यादि को देख सकते हैं।

अब यह एक हरा तारा (बौद्ध का स्त्री स्वरुप) का चित्र है। इसका उत्तम छायांकन, रूप की उत्कृष्ट प्रस्तुति, उसी तरह से है, जैसे आप अजंता के चित्रों में देखते हैं। इसमें चित्रित उभरे हुए नेत्रों पर भी ध्यान दें, यह भारतीय कला की मध्ययुगीन परंपरा में भी प्रचलित था। आपको वस्त्रों में विविधता दिखाई देगी, जो आपको याद दिलाएगी, सिल्क रुट की वह कला जो यूरोप को एशिया से जोड़ती थी।

यह  कला कश्मीर और लद्दाख से प्रारम्भ हो कर, नाला सोपारा से होते हुए, दक्षिण भारत में  केरल तक आ गई। आप किनारों पर कुछ आकृतियां भी देख सकते हैं; जबकि देवताओं को केंद्र में बनाया गया है, ये आकृतियां जो किनारों पर बनी हैं, वह जीवंतता और आनंद की एक महान भावना को व्यक्त करती हैं। असल में यह आनंद की ही भावना है, जो कश्मीर की कला का एक विशेष गुण है। एक बात और याद दिलाना चाहूंगा कि, भारतीय परंपरा के सौंदर्यशास्त्र के सबसे बड़े दार्शनिकों में से एक – अभिनवगुप्त, भी कश्मीर घाटी में ही रहते थे। वे इन कलाकारों के काल से ठीक पहले रहते थे, जिन्होंने इसे चित्रित किया होगा।

पुनः  कश्मीरी चित्रकारों द्वारा बनाई गई अलची पेंटिंग के विवरण पर आते हैं। यह बलराम का मंदिर है, और आप देखेंगे कि इसमें हरे रंग का तारा का एक लाट (मीनार) है। और यह एक ऐसा लक्षण है, जो हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के देवताओं के एक साथ होने की एक विशेषता को दर्शाता है,, जिसे आप न केवल यहां ही नहीं देखते हैं, बल्कि आप चीन की गुफाओं, जापान एवं और कई अन्य स्थानों पर देखते हैं। आप चित्रों के निचले हिस्से में संगीतकारों को भी देख सकते हैं, जो इन चित्रों को फिर से उस  उमंग से भर देते है, जो इन चित्रों की विशेषता है।

यह मण्डल देवता है, जो कन्नूर में बहुत ऊंचाई पर स्थित, किन्नौर में नाको के मठ का हिस्सा है। फिर से यह कश्मीरी चित्रकार हैं, जिनके चित्रों में आप सौम्यता को देखेंगे, आंतरिक दृष्टि, अनुग्रह (सुघड़ता), स्नेहपूर्ण अनुग्रह देखेंगे, जो आपको याद दिलाएगा, कि दुनिया के दुःख का अंत हो गया है।


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