रविवार, अक्टूबर 17, 2021
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10 वीं शताब्दी के भारतीय चित्रों में “व्यक्ति चित्र” |

राजा राजा चोल अपने गुरु, गुरु करुवूर के साथ। यह भारतीय चित्रकला का सबसे पुराना शेषमात्र जीवित व्यक्ति चित्र है। यह 10 वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था। भारतीय कला के बारे में सबसे अद्भुत बात यह है कि  एक हजार पांच सौ वर्षों तक अनेकों चित्र बनाये गए, हजारों मूर्तियां, देवता बनाए गए, जानवर बनाए गए, सुंदर फूल- फल और पेड़ बनाए गए, और आम आदमी को भी चित्रित किया गया। किन्तु व्यक्ति चित्र कभी नहीं बनाए गए। यहाँ तक की उस राजा के भी नहीं जिसके शासनकाल में कला का निर्माण हो रहा था। कला का उद्देश्य – हमें अहंकार, मानवीय चिंताओं और अपने स्वयं के महत्व से दूर  ले जाना था, और इसी कारण से, उस समय एक व्यक्ति चित्र पूरी तरह से अनावश्यक था, और कला के उद्देश्य के विपरीत था।

चित्र सूत्र के अनुसार यह स्पष्ट था कि, कला किसी भी व्यक्ति विशेष से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इसे केवल शाश्वत मूल्यों और शाश्वत विषयों को व्यक्त करना चाहिए।   किन्तु इसमें भी कुछ अपवाद उपस्थित थे।

कुषाणों के काल में, अर्थात जब प्रथम शताब्दी में मध्य एशिया से कुषाण शासक आये थे, उन्होंने अपने मंदिरों में खुद के चित्र बनवाये। लेकिन उनके शासनकाल के अंत के पश्चात, भारतीय परंपरा तुरंत अपने वास्तविक रूप में वापस लौट आई। 7वीं -8 वीं शताब्दी की मूर्तिकला में मामल्लपुरम में पहला व्यक्ति चित्र देखने को मिलता है। आज जिस चित्र की बात हम कर रहे हैं, वह 10 वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया है। यह सबसे पुराना शेषमात्र जीवित चित्र है। उसमें राजा राजा चोल और उनके गुरु, गुरु करुवूर हैं। एक दिलचस्प बात यह है, कि क्योंकि राजा यहाँ एक परंपरा को तोड़ते हुए खुद को कला में प्रस्तुत कर रहे हैं और यह संकोच इस चित्र में दृष्टिगत होता है। चित्र बनवाते समय राजा ने स्वयं को अपने गुरु की छाया में पीछे की ओर खड़ा दिखाया हैं।

यह परंपरा 13वीं शताब्दी तक देश के विभिन्न स्थलों और विभिन्न मंदिरों में जारी रही। राजा के कुछ चित्र दिखाई देने लगे, लेकिन आमतौर पर राजा को बहुत छोटा बना दिया जाता था, या राजा को शिव लिंग के सामने प्रार्थना करते हुए बनाया जाता था, या राजा को गुरु के सामने घुटने टेकते हुए बनाया जाता था. राजा ने खुद को कला में पेश करना शुरू कर दिया, लेकिन ऐसा करते हुए भी, विनम्रता की भावना को साथ रखा। कुछ वर्षों पश्चात आप देखेंगे की यह भावना बदल गयी और धीरे-धीरे राजा खुद को बहुत ही महानता और आत्म-महत्व की महान भावना के साथ दिखाने लगे। यह बिंदु वास्तव में भारतीय परंपरा की कला में बहुत बड़ी चीजों में से एक है।


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