वर्ण, वेद व आधुनिक समाज — मोहित भारद्वाज द्वारा एक व्याख्यान

क्या हम स्वतंत्र हैं या पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित विश्व में जकड़ें हुए हैं ? क्या हमनें पूर्वजों की शिक्षा, भाषा और नैतिक मूल्यों को भुला दिया हैं? हम अपनी जड़ों से भटक गए हैं । हमें वापस लौटना हैं और 'वैदिक भारत' को पुनर्जीवित करना हैं। इस व्याख्यान में आपको

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‘संस्कृतम् : आत्मा की भाषा’ — सम्पदानंदा मिश्रा द्वारा एक भाषण

https://www.youtube.com/watch?v=40uaJAGj3bc&t=1049s ओ३म् जीवने यावदा दानम् , स्यात् प्रदानं ततोधिकम् इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् , भगवन् परिपूर्यताम् त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वं मम देव देव सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ओं शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः सर्वेभ्यो नमो नमः   आप सबको नमस्कार मुझे ये बोला

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